‘धर्मनिरपेक्षता’ यानी राजनेताओं की ‘वोट बैंक’ की राजनीति

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भारतीय संविधान, भारत को एक धर्मनिरपेक्ष राज्य करार देता है। भारतीय संविधान की पूर्वपीठिका (preamble) में “धर्म निरपेक्ष” शब्द ४२वें संशोधन द्वारा सन् १९७६ में जोड़ा गया किन्तु ऐतिहासिक रूप से भारत में “सर्वधर्म सम्भाव”, “वसुधैव कुटुम्बकम” और वैचारिक एंव दार्शनिक स्वतंत्रता अनादी काल से चली आ रही है। मैथिली शरण गुप्त ने अपनी कविता “भारत माता का मन्दिर यह” में लिखा था,

“जाति-धर्म या संप्रदाय का, नहीं भेद-व्यवधान यहाँ,
सबका स्वागत, सबका आदर, सबका सम सम्मान यहाँ ।
राम, रहीम, बुद्ध, ईसा का, सुलभ एक सा ध्यान यहाँ,
भिन्न-भिन्न भव संस्कृतियों के, गुण गौरव का ज्ञान यहाँ ।”

विश्व भर में धर्म निरपेक्षता का अर्थ होता है की राज्य का कोई धर्म नहीं हो, परन्तु दुखद सत्य यह है कि भारत के कई राजनैतिक दल, जो स्वंय को धर्म निरपेक्ष कहते हैं, उन्होंने धर्म-निरपेक्षता के अर्थ को ही बदल डाला है! इन दलों के अनुसार दूसरों को साम्प्रदायिक कहना, विशिष्ट सम्प्रदायों के लिये पक्षपाती कानून बनाना अौर कुछ समुदायों के धर्म-गुरुअों के अागे माथा टेकना, धर्म-निरपेक्षता की पहचान है। अालम तो यह है कि अाज कल इन दलों में होड़ लगी हुई है कि कौन किस अल्पसंख्यक समुदाय की ज़्यादा खातिरदारी करेगा! क्या धर्म या जाति के अाधार पर समुदायों के बीच भेदभाव करने वाले स्वयं को धर्म-निरपेक्ष कहलाने का अधिकार रखते हैं? कदापि नहीं।

कई बुद्धिजीवियोें का मानना यह है कि एक संतुलित समाज के लिये पुरातनकाल से समाज में फैली विकृतियों को दूर कर, सभी समुदायों को समतल स्थान देना अावश्यक है। मैं इस बात से पूर्णत: सहमत हूँ, परन्तु क्या भारत की तत्कालीन नीतियाँ यह सपना साकार करने में सफल हुई हैं? अाइये इस अायाम पर गम्भीर नज़र डालते हैं। पिछले बीस सालों में कई उदाहरण सामने अाये हैं, जब इन धर्म-जाति अाधारित नीतियों का दुरुपयोग होता नज़र आया, पर क्या कारण है कि आज भी यह तथाकथित समाजवादी व धर्म-निरपेक्ष दल, इन नीतियों पर पुन:विचार करने से कतराते हैं? भारतीय संविधान के अनुसार आरक्षण की सीमा 50% पर निर्धारित की गई है जो की पार भी हो चुकी है, लेकिन क्या कारण है कि यह धर्म-निरपेक्ष दल अल्पसंख्यक समुदायों को अारक्षण का झूठे वायदे करने से फिर भी हिचकिचा नहीं रहे है? इन सभी प्रश्नों का एकमात्र उत्तर है – वोटबैंक की घिनौनी राजनीती। इन दलों का प्रमुख अस्त्र है, पिछड़ी जातियों व अल्पसंख्यक समुदायों की पीड़ा का फायदा उठाते हुए, उन्हें पक्षपातपूर्ण नीितयों का प्रलोभन दे कर उनके मत बटोर लेना। उन्हें इस बात से कोई सरोकार नहीं है कि वह नीतियाँ उन जनसमुदायों को वाकई कोई लाभ पहुँचायेंगी या नहीं। डॉ तनवीर फज़ल के 2013 में किये गये शोध के अनुसार, यूपीए सरकार की नितियों का फायदा अल्पसंख्यक समुदायों को न-के-बराबर पहुँचा है। उनके शोध के अनुसार मुस्लिम समुदाय के लोगों में गरीबी राष्ट्रीय अौसत के मुकाबले 6% अधिक है।19% मुस्लिम बालक, व 23% बालिकाएें विद्या से वंचित हैं। शिशु व 5-वर्ष से कम अायु के बच्चों कि मृत्यु दर भी मुस्लिम समुदाय में राष्ट्रीय अौसत से अधिक है। क्या कारण है कि पिछले 10 साल से भारत में स्वंय को मुसलमान समुदाय का मसीहा कहने वाली कांग्रेस पार्टी की सरकार होने के बाद भी, अल्पसंख्यक मुस्लिम समुदाय का विकास नहीं हो पाया? स्वयं को सेक्यूलर कहने वाले दल, न सिर्फ धर्म-निरपेक्षता का ढोंग करते हैं बल्कि यह दल पिछड़ी जातियों व अल्पसंख्यक समुदायों की पीड़ा को अपने स्वार्थ के लिये भुनाने से ज़रा भी नही कतराते। यदि ऐसा न होता तो मुज़फ्फरनगर के दंगों के पीड़ित परिवारों के बच्चे राहत-कैंपों में मर नहीं रहे होते, न हीं एक समुदाय के पीड़ितों को सरकार ने पीड़ित मानने से ही इन्कार किया होता। यदि एक ही दल सारी साम्प्रदायिकता की जड़ है तो मुज़फ्फरनगर में धर्म-निरपेक्ष सरकार होने के बाद भी दंगे क्यूँ हुए? दंगों के बाद पीड़ितों को मरने के लिये क्यूँ छोड़ दिया गया? न्याय मिलने में देर व पक्षपात क्यूँ हो रहा है? मेरे विचार में यदि वोटबैंक की राजनीति को साम्प्रदायिकता का सबसे विकृत रूप कहा जाये तो यह अतिश्योक्ति नहीं होगी।

मेरा एेसा मानना है कि तत्कालीन परिस्थितियों में भारत की सबसे बड़ी परेशानी यह वोटबैंक की राजनीती ही है जो साम्प्रदायिकता की जननी भी है। क्या एक समुदाय के किसान की परेशानियाँ दूसरे समुदाय के किसान से भिन्न होती हैं? यदि प्रदेश व देश विकसित होगा तो क्या सभी जातियों व समुदाय के युवा महनत कर दो जून की रोटी नहीं कमा पायेंगे? यदि नदियों कि सफाई होगी तो क्या सभी समुदाय के लोगों के घरों में स्वच्छ पानी नहीं जायेगा, क्या अस्वच्छ पानी के कारण उपजी बिमारियों से मरने वालों की संख्या में कमी नहीं अायेगी? मेरे विचार में इन सभी परेशानियों का एकमात्र उपाय है भेद-भाव मुक्त विकास। भारत की सबसे घनी अाबादी वाला प्रदेश, उत्तर प्रदेश इन तथाकथित धर्म-निरपेक्ष दलों के मायाजाल में पिछले 10 सालों से फंसा पड़ा है। प्रदेश के कई सामर्थ्य रखने वाले उद्योग अब मरणासन्न स्थिति में पहुँच चुके हैं। प्रदेश में युवाअों के लिये नौकरियाँ नहीं हैं। पीएचडी चेम्बर अाॅफ कामर्स की रिपोर्ट के अनुसार उत्तर प्रदेश में रहने वाला नागरिक अौसतन ₹ 23132 कमाता है जो कि राष्ट्रीय अौसत (₹ 44345) का अाधा है। उत्तर प्रदेश के पास मानवीय व प्राकृतिक संसाधनों की कोई कमी नहीं है, परन्तु फिर भी प्रदेश भारत के कुल अार्थिक पूंजीनिवेश का मात्र 1-3% हिस्सा ही अाकर्षित कर पाता है। भारतीय जनगणना विभाग की 2011 की रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश में साक्षरता दर राष्ट्रीय अौसत से काफी कम है। प्लानिंग कमीशन की 2009 की रिपोर्ट का मानना है कि उत्तर प्रदेश की 37.7% गरीब है जबकी राष्ट्रीय अौसत 29.8% ही है। प्रदेश, देश के बाकी के 15 बड़े राज्यों की तुलना में शासन-प्रणाली में 9वें स्थान पर, अार्थिक बल में 10वें स्थान पर, मूलभूत सुविधाअों में 12वें स्थान पर व मानव संसाधन में अाखिरी स्थान पर अाता है। राष्ट्र की स्थिति भी दूसरे देशों की तुलना में कोई बहुत अच्छी नहीं हैं।

यह सभी अांकड़े सिर्फ एक ही कहानी कहते नज़र अाते हैं कि न सिर्फ प्रदेश को, बल्कि देश को भी विकास व सुराज की सख्त़ अावश्यकता है। लेकिन विडम्बना यह है कि देश-प्रदेश की कई प्रमुख पार्टियाँ विकास के मुद्दे पर चर्चा करने को तैयार ही नहीं हैं। अौर इसका कारण यह है कि, यह सभी दल प्रदेश या देश का विकास करने में पूर्णत: विफल हुए हैं, अत: ये चर्चा करेंगे भी तो किस मुँह से ? क्या लालू यादव बता सकते हैं कि उन्होंने अपने कार्यकाल में किसानों अौर चरवाहों का क्या भला किया? क्या राहुल गाँधी बता सकते हैं कि उनकी तीन पुश्तें “गरीबी हटाअो” कहती अा रही हैं पर अाज तक गरीबी हटा क्यों नहीं पाई? अाखिर कब तक हम इन ढोंगी दलों के मायाजाल में फंस कर, भारत के विकास को सूली पर चढ़ाते रहेंगे? अब समय अा चुका है कि हम इन सरकारों से इनके द्वारा किये गये विकास का हिसाब माँगे अौर सभी दलों को विकास के मुद्दे पर चर्चा करने पर मजबूर करें।

भारत पर इस समय सम्पूर्ण विश्व की नज़र है। इस सदी कि शुरुअात में भारत का लोहा दुनिया ने मान लिया था अौर अर्थशास्त्र के महा-पंिडतों ने यह भविष्यवाणी की थी यह सदी भारत-चीन-ब्राज़ील-रूस की सदी होगी। परन्तु पिछले दस सालों में इस सूची के बाकी के देश, दिन दूनी, रात चौगुनी तरक्की करते गये, अौर हम दिन-पर-दिन नीति पक्षाघात (policy paralysis) अौर घटिया जनवादी नितियों के कारण िपछड़ते गये। मेरी नजर में भारत इस समय उस मोड़ पर खड़ा है जिसमें वह या तो वह पुरजोर अात्मविश्वास के लैस, विश्व-प्रतिस्पर्धा में अपना न्यायसंगत स्थान पुन: हासिल कर सकता है या अपने ही अन्तरद्वंदो में उल़झ कर विकास की राह से भटक सकता है। एेसे में क्या हम गलत मुद्दों पर चुनावी बहस कर, अपना कीमती मत किसी अनुभवहीन, ढोंगी या अकुशल पार्टी को देने का जोखिम उठा सकते हैं? 2014 में अापका मत अपने लिये होगा या भारत के लिये, यह निर्णय तो अापको करना है। अाशा है कि इक़बाल के यह शब्द हमेशा की तरह हर भारतीय को प्रेरित करने में सक्षम रहेंगे,

हुब्बे वत़न समाये, अाँखों में नूर होकर,
सर में खुमार होकर, दिल में सुरुर होकर।

Published in Niti Central: http://www.niticentral.com/hindi/2014/04/24/secularism-is-the-other-name-of-vote-bank-politics-215722.html

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Author: nehasri

Interested in Science, Religion, Politics, History, Literature, Technology - opinions strictly my own.

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